खाड़ी में बारूद की गूंज, भारत की जेब पर प्रहार: 146 डॉलर पहुंचा क्रूड, क्या 15 रुपये तक बढ़ेंगे तेल के दाम?

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ईरान और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव और हालिया हमलों ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में हड़कंप मचा दिया है। खाड़ी देशों के महत्वपूर्ण ऊर्जा ठिकानों पर हुए हमलों के बाद, 19 मार्च को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 30% तक की भारी तेज़ी देखी गई है। यह स्थिति न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, बल्कि भारत के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है।

 

क्रूड ऑयल की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल

 

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की वजह से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें लगभग दोगुनी होकर 146 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुँच गई हैं। वैश्विक तेल बाज़ार को मुख्य रूप से तीन बेंचमार्क - ब्रेंट, डब्ल्यूटीआई (WTI) और ओपेक (OPEC) बास्केट - के आधार पर पहचाना जाता है। इनमें से ब्रेंट क्रूड, जो उत्तरी सागर (यूरोप) से निकलता है और दुनिया के दो-तिहाई तेल व्यापार का आधार है, की कीमतें इस संघर्ष के बाद 73 डॉलर से बढ़कर 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं।

 

भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों का निर्धारण 'इंडियन बास्केट' के आधार पर होता है, जो भारत द्वारा विभिन्न देशों (जैसे इराक, सऊदी अरब, रूस, यूएई) से खरीदे जाने वाले अलग-अलग प्रकार के तेलों का औसत मूल्य है। 'इंडियन बास्केट' के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड में भी इस उछाल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है।

 

भारत पर पड़ने वाला असर

 

भारत अपनी ज़रूरत का 85% कच्चा तेल और 50% से ज़्यादा गैस आयात करता है। ऐसे में, वैश्विक बाज़ार में तेल और गैस की कीमतों में कोई भी हलचल सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की जेब को प्रभावित करती है। इस संकट के भारत पर होने वाले असर को मुख्य रूप से दो बिंदुओं में समझा जा सकता है:

 

1.     पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों में वृद्धि की आशंका: कच्चे तेल की कीमतों में आए इस उछाल के कारण सरकारी तेल कंपनियों के लिए मौजूदा कीमतों पर पेट्रोल, डीजल और गैस बेचना मुश्किल हो जाएगा। यदि कच्चे तेल के दाम इसी स्तर पर बने रहते हैं, तो आने वाले दिनों में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 10 से 15 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो सकती है। हालाँकि, सरकारी तेल कंपनियों ने फिलहाल अपने मार्जिन को कम करके या घाटा सहकर कीमतों को स्थिर रखा है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी संसद में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के पूरी तरह सुरक्षित होने का आश्वासन दिया है। लेकिन, यदि अगले 1-2 हफ़्तों तक क्रूड के दाम इसी उच्च स्तर पर रहते हैं, तो सरकार के पास दाम बढ़ाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा।

 

2.     खाने-पीने की चीज़ों और अन्य वस्तुओं की महंगाई: कच्चे तेल का इस्तेमाल केवल पेट्रोल और डीजल बनाने में ही नहीं होता, बल्कि यह पेंट, प्लास्टिक, फर्टिलाइज़र और दवाओं के लिए कच्चे माल के रूप में भी उपयोग किया जाता है। डीजल के दाम बढ़ने से माल ढुलाई (ट्रांसपोर्टेशन) की लागत बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर फलों, सब्ज़ियों और अनाजों की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे वे महँगी हो सकती हैं। कुल मिलाकर, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से आम आदमी का बजट बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है।

 

वैश्विक गैस बाज़ार पर प्रभाव

 

खाड़ी संकट का असर केवल तेल पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक गैस बाज़ार पर भी पड़ा है, विशेषकर यूरोप और ब्रिटेन में। ईरान के हमलों के कारण कतर के रास लफ्फान प्लांट को भारी नुक़सान पहुँचा है। यह दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी (LNG) हब है और वैश्विक आपूर्ति का लगभग पाँचवाँ हिस्सा (20%) यहीं से आता है। इस हमले के बाद प्लांट को फ़िलहाल बंद कर दिया गया है, जिससे आपूर्ति बाधित हो गई है।

 

·         यूरोप: यूरोप में गैस की कीमतों में 30% से ज़्यादा का उछाल आया है। यहाँ मुख्य गैस कॉन्ट्रैक्ट 'डच TTF बेंचमार्क' एक समय 30% तक उछलकर 70 यूरो तक पहुँच गया था, हालाँकि अभी यह 16% की तेज़ी के साथ 63 यूरो के करीब ट्रेड कर रहा है।

 

·         ब्रिटेन: ब्रिटेन में थोक गैस की कीमतें 171.34 पेंस प्रति थर्म ($2.29) तक पहुँच गई हैं, जो जनवरी 2023 के बाद का उच्चतम स्तर है। संघर्ष शुरू होने के बाद से कीमतों में लगभग 140% की वृद्धि हुई है, जबकि युद्ध से पहले यह 71.13 पेंस प्रति थर्म ($1.33) थी।

 

सप्लाई चेन में व्यवधान और चुनौतियाँ

 

क्रूड ऑयल और गैस की कीमतों में वृद्धि के पीछे दो मुख्य कारण हैं: कतर के रास लफ्फान प्लांट का बंद होना और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का लगभग बंद हो जाना।

 

·         रास लफ्फान प्लांट: जैसा कि ऊपर बताया गया है, कतर का यह प्लांट वैश्विक एलएनजी आपूर्ति का 20% हिस्सा नियंत्रित करता है। इसके बंद होने से गैस की वैश्विक आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है।

 

·         'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज': यह 167 किमी लंबा जलमार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और वैश्विक तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया के कुल पेट्रोलियम का 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुज़रता है। सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे प्रमुख तेल निर्यातक देश अपने निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं। भारत भी अपनी ज़रूरत का 50% कच्चा तेल और 54% एलएनजी इसी रास्ते से मँगाता है। वर्तमान संघर्ष के कारण यह मार्ग अब सुरक्षित नहीं रह गया है और ख़तरे को देखते हुए कोई भी तेल टैंकर वहाँ से नहीं गुज़र रहा है। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि उसकी ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इस मार्ग पर निर्भर करता है। ईरान स्वयं इसी मार्ग से निर्यात करता है, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई है।

 

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