'ईरान से जिसे मोहब्बत तो वहीं चले जाओ...’ आसिफ मुनीर ने शिया धर्मगुरुओं को दी धमकी, कहा – जिन्ना भी इसी समुदाय से ...

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इस्लामाबाद/रावलपिंडी पाकिस्तान के सैन्य गलियारों और धार्मिक समुदायों के बीच एक नया और गहरा तनाव पैदा हो गया है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख (COAS) जनरल आसिम मुनीर के एक हालिया बयान ने देश की लगभग 15 प्रतिशत शिया आबादी के भीतर नाराजगी और असुरक्षा की लहर दौड़ा दी है। रावलपिंडी में आयोजित एक इफ्तार पार्टी, जिसे आपसी भाईचारे और राष्ट्रीय एकजुटता का प्रतीक माना जा रहा था, वह अचानक एक कड़वे कूटनीतिक और सांप्रदायिक विवाद का केंद्र बन गई।

 

क्या है पूरा विवाद?

 

मीडिया रिपोर्ट्स और बैठक में मौजूद धार्मिक नेताओं के अनुसार, जनरल आसिम मुनीर ने शिया उलेमाओं (धर्मगुरुओं) को संबोधित करते हुए बेहद सख्त लहजे में कहा कि जो लोग पाकिस्तान में रहकर ईरान के प्रति अपनी अटूट वफादारी प्रदर्शित करते हैं, उनके लिए सीमाएं खुली हैं, वे ईरान जा सकते हैं। मुनीर का यह बयान 1 मार्च को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद पाकिस्तान में भड़के हिंसक प्रदर्शनों की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

 

जनरल मुनीर ने स्पष्ट किया कि किसी दूसरे देश (ईरान) की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान की धरती पर अफरा-तफरी और हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि विदेशी वफादारी के नाम पर देश की संप्रभुता और कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने की अनुमति किसी को नहीं है।

 

अचानक बैठक छोड़कर गए मुनीर: अपमान का आरोप

 

इस घटनाक्रम में नाटकीय मोड़ तब आया जब जनरल मुनीर बिना औपचारिक समापन के बैठक बीच में ही छोड़कर चले गए। उलेमाओं को बताया गया था कि इफ्तार और नमाज के बाद विस्तृत चर्चा होगी, लेकिन सेना प्रमुख का अचानक जाना शिया नेताओं को नागवार गुजरा। इसे न केवल एक समुदाय का अपमान माना जा रहा है, बल्कि यह पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार है जब सैन्य नेतृत्व ने किसी बड़े धार्मिक समुदाय के प्रति इस तरह का सार्वजनिक कड़ा रुख अपनाया है।

 

देशभक्ति पर सवाल: शिया समुदाय की दलील

 

शिया समुदाय के नेताओं ने जनरल मुनीर के इस बयान को अपनी देशभक्ति पर सीधा प्रहार बताया है। शिया धर्मगुरु मोहम्मद शिफा नजफी ने बैठक में ही सेना प्रमुख की बातों का कड़ा प्रतिवाद किया। उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं शिया समुदाय से थे। देश की सेना और संसाधनों के निर्माण में इस समुदाय का अद्वितीय योगदान है। धार्मिक स्थलों (मक्का, मदीना, नजफ और मशहद) से लगाव रखना आस्था का विषय है, इसे देशद्रोह या कमतर देशभक्ति से नहीं जोड़ा जा सकता। नेताओं का कहना है कि गिलगित-बाल्टिस्तान या कराची की हिंसा के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना अनुचित है।

 

ईरान-सऊदी संतुलन और बदलती विदेश नीति

 

जानकारों का मानना है कि जनरल मुनीर का यह 'आउटबर्स्ट' केवल घरेलू हिंसा तक सीमित नहीं है। यह पाकिस्तान की बदलती विदेश नीति का भी संकेत है। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान, ईरान और सऊदी अरब के बीच एक नाजुक संतुलन बनाकर चलता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान का झुकाव सऊदी अरब और उसके सहयोगियों की ओर बढ़ा है। ईरान के साथ बढ़ते तनाव और सीमा पार झड़पों ने भी सैन्य नेतृत्व को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर किया है।

 

बैकग्राउंड: खामेनेई की हत्या और पाकिस्तान में आगजनी

 

विवाद की जड़ें मार्च की शुरुआत में हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या के बाद पाकिस्तान के कई शहर सुलग उठे थे:

 

1.     कराची: प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास की ओर मार्च किया, जिसके बाद हुई फायरिंग में 10 लोगों की जान गई।

 

2.     इस्लामाबाद: पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं।

 

3.     स्कार्दू और गिलगित: यहाँ संयुक्त राष्ट्र (UN) के कार्यालयों को निशाना बनाया गया और व्यापक स्तर पर संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया।

 

सेना का आधिकारिक पक्ष

 

हालाँकि, विवाद बढ़ने के बाद पाकिस्तान सेना के जनसंपर्क विभाग (ISPR) ने एक संभला हुआ बयान जारी किया। सेना की ओर से कहा गया कि बैठक का उद्देश्य 'राष्ट्रीय एकता' को बढ़ावा देना था और सेना प्रमुख ने केवल सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की थी। 'ईरान चले जाओ' वाले हिस्से पर सेना ने आधिकारिक तौर पर चुप्पी साध रखी है।

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