नई दिल्ली। भारतीय न्याय व्यवस्था में महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादास्पद फैसले को पलट दिया है, जिसमें किसी लड़की के साथ की गई ऐसी अभद्रता को 'रेप की कोशिश' न मानकर केवल 'रेप की तैयारी' करार दिया गया था। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों की व्याख्या करने में गंभीर चूक की है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपियों द्वारा लड़की के प्राइवेट पार्ट्स को पकड़ना और उसके पायजामे की डोरी तोड़कर उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करना, स्पष्ट रूप से 'रेप की कोशिश' (Attempt to Rape) की श्रेणी में आता है। अदालत ने कहा कि पहली नजर में शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह कृत्य केवल अपराध की तैयारी तक सीमित नहीं था, बल्कि अपराध को अंजाम देने का एक सीधा प्रयास था।
यह मामला साल 2021 का है, जब उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में एक 14 साल की नाबालिग बच्ची के साथ तीन युवकों पवन, आकाश और अशोक ने रास्ते में छेड़खानी की थी। बाइक पर घर छोड़ने के बहाने आरोपियों ने बच्ची के साथ अश्लील हरकतें कीं और उसे जबरन खींचने की कोशिश की। शोर मचाने पर जब राहगीर मदद के लिए पहुंचे, तो आरोपियों ने उन्हें तमंचा दिखाकर धमकाया और फरार हो गए। इस मामले में पुलिस ने आरोपियों पर IPC की धारा 376 और POCSO एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।
विवाद तब शुरू हुआ जब 17 मार्च, 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने आरोपियों की रिविजन पिटीशन स्वीकार करते हुए उनके ऊपर से 'रेप की कोशिश' की धाराएं हटा दी थीं। हाईकोर्ट का तर्क था कि पायजामे का नाड़ा तोड़ना या निजी अंगों को छूना केवल अपराध की 'तैयारी' है, न कि 'कोशिश'। इस फैसले के आते ही देशव्यापी आक्रोश फैल गया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए 25 मार्च, 2025 को हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बहाल करने का संकेत दिया है, जिसमें आरोपियों पर रेप की कोशिश और POCSO एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चलाने की बात कही गई थी। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में यौन अपराधों की व्याख्या के लिए एक नजीर साबित होगा, जिससे अपराधियों को 'कानूनी तकनीकी बारीकियों' का फायदा उठाकर बचने का मौका नहीं मिलेगा।