भारतीय सिनेमा के विराट परिदृश्य में ऋषभ शेट्टी उस दुर्लभ खोज के रूप में सामने आए हैं, जो केवल एक अभिनेता या निर्देशक नहीं, बल्कि एक पूर्ण कथाशिल्पी हैं। उनमें भारतीय लोकजीवन की वह ग्राम्य लय है, जो किसी देवस्थान की घंटी की तरह गूँजती रहती है — लंबी, स्थायी और आत्मा को छू लेने वाली। वे आधुनिक भारतीय फिल्मकारों में उस परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जो सिनेमा को केवल दृश्य माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में देखते हैं।
यदि “कांतारा” किसी और ने बनाई होती, तो संभवतः उसके केंद्र में नायक होता — उसका संघर्ष, उसका पराक्रम। पर ऋषभ शेट्टी का कमाल यह है कि उन्होंने अपने ही अभिनय को कथा की पृष्ठभूमि में विलीन कर दिया, ताकि मंच पर लोक, देवत्व और प्रकृति का विराट रूप केंद्र में रह सके। यही उनके सिनेमा का असाधारण सौंदर्य है — जहाँ कलाकार नहीं, बल्कि कथा का आत्मा बोलती है।
भारतीय सिनेमा से स्थापित किया एक नया संवाद
मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा दशकों तक “बिल्ला नंबर 786” और “एंग्री यंग मैन” जैसे प्रतीकों पर टिका रहा, जहाँ नायक ईश्वर को चुनौती देकर या उसके मंदिर से दूर रहकर अपनी वीरता साबित करता था। वहीं स्त्री पात्र केवल करुणा या त्याग का प्रतीक बनकर रह जाती थी। इस प्रवृत्ति के विपरीत, ऋषभ शेट्टी का सिनेमा देवत्व और लोक आस्था को पुनः केंद्र में लाता है।
“कांतारा” हमें याद दिलाती है कि असली सुरक्षा किसी हथियार या पद में नहीं, बल्कि लोकदेवता की हुंकार और प्रकृति की आभा में छिपी होती है। जब गुलिगा और पंजुरली की गूँज सिनेमाघर की दीवारों से टकराती है, तो दर्शक के भीतर एक आदिम कंपन उत्पन्न होता है — मानो वह अपने भूले हुए पूर्वजों से संवाद कर रहा हो।
संगीत जो लोक को जीवित करता है
“कांतारा – चैप्टर 1” का संगीत इसकी आत्मा है। यह केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि पूरा लोक-संसार रचता है। कहीं ढोल की थाप है, कहीं पायल की झंकार, तो कहीं देवता की हुंकार। और इन सबके बीच जो मौन है, वही इस संगीत की गहराई है। ऋषभ शेट्टी ने ध्वनि को कथा का वाहक बनाया है — यह संगीत आपको केवल सुनाई नहीं देता, बल्कि आपके भीतर गूंजता है।
जैसा कि कवि जॉन कीट्स ने कहा था – “Full Throated Ease”, यानी ऐसा स्वर जो बिना किसी आडंबर के सहज और पूर्ण हो। “कांतारा” का संगीत ठीक वैसा ही है – वह आपको अपने भीतर खींच लेता है और वहीं थामे रखता है।
सिनेमेटोग्राफी अपने आप में एक उपासना
फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अपने आप में एक उपासना है। लाल माटी से ढँकी धरती, वर्षा में भीगे वन, और अंधकार में छिपे दृश्य – सब मिलकर दैविक आभा का आलोक रचते हैं। कैमरा केवल दृश्य नहीं दिखाता, बल्कि आस्था की स्पंदनशीलता को पकड़ता है। हर फ्रेम में प्रतीक हैं, हर दृश्य एक प्रार्थना की तरह लगता है।
कथा का आरंभ एक राजा से होता है — समृद्ध, परंतु अशांत। उसके पास सब कुछ है, पर भीतर शांति नहीं। वह अंततः अपनी व्याकुलता को लोकदेवता के चरणों में समर्पित करता है। यह दृश्य केवल एक पात्र की कथा नहीं, बल्कि मानव अहंकार के पराभव की आध्यात्मिक व्याख्या है।
जहाँ आस्था के भीतर ही संशय जन्म लेता है
इस बार की कहानी और भी गहरी है। ऋषभ शेट्टी ने दिखाया है कि आस्था को नष्ट करने के प्रयास भी आस्था के नाम पर ही किए जाते हैं। मानो हर प्रकाश के भीतर उसका अंधकार छिपा हो। फिल्म के पहले आधे हिस्से में यह द्वंद्व धीरे-धीरे आकार लेता है, और इंटरवल के बाद यह संघर्ष लोककथा के वेग में बदल जाता है — जैसे किसी प्राचीन पुराण की कथा चरम पर पहुँचती हो।
ऋषभ शेट्टी का अभिनय इस चरण में अपनी पराकाष्ठा पर है। उनकी आँखों में भय, विस्मय और समर्पण का जो संगम है, वह दर्शक को अपने साथ बहा ले जाता है। वे अब केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक प्रतीक, एक ‘दैव’ बन चुके होते हैं।
भारतीय ग्राम्य सभ्यता की आत्मा
भारत के हर कोने में — चाहे कर्नाटक के तुलु भाषी गाँव हों या हिमालय की घाटियाँ — एक साझा सांस्कृतिक चेतना है: देवता और प्रकृति का सहअस्तित्व। हमारे लोक में हर पत्थर, हर नदी, हर वृक्ष देवत्व से परिपूर्ण माना गया है। यही वह बोध है जो “कांतारा” को केवल दक्षिण भारत की कहानी नहीं रहने देता, बल्कि सम्पूर्ण भारत का सांस्कृतिक दर्पण बना देता है।
“कांतारा – चैप्टर 1” यह याद दिलाता है कि आस्था किसी ग्रंथ से नहीं, बल्कि लोकानुभव से उपजती है। शहरी दर्शकों को यह कथानक शायद “कम रिलेटेबल” लगे, पर ग्रामीण भारत के लिए यह जीवन का सत्य है। ऋषभ शेट्टी ने इसी सत्य को सिनेमा और समाज के बीच पुल की तरह खड़ा कर दिया है।
कथा और पात्रों का दिव्य संयोजन
फिल्म के कथा-संरचना की बुनावट अत्यंत सलीकेदार है। कहानी “मधुबन” नामक पवित्र स्थल से शुरू होती है — एक ऐसी भूमि, जहाँ परंपराएँ केवल निभाई नहीं जातीं, बल्कि श्वास की तरह जी जाती हैं। यहाँ के निवासियों की दुनिया में जब बाहरी व्यापारिक ताकतें प्रवेश करती हैं, तो उनके भीतर भी परिवर्तन की आकांक्षा जागती है। परंतु इस आकांक्षा के बीच कई रहस्य हैं, जो धीरे-धीरे प्रकट होते हैं और कथा को एक मिथकीय विस्तार देते हैं।
ऋषभ शेट्टी द्वारा निभाया गया बेड़मे का किरदार अभिनय से अधिक साधना प्रतीत होता है। वहीं रुक्मिणी वसंत, जो राजकुमारी कनकवती के रूप में स्क्रीन पर आती हैं, एक अलौकिक चमक लेकर आती हैं — जैसे किसी प्राचीन मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण कोई श्लोक पुनः जीवन पा गया हो।
आस्था बनाम आधुनिकता
फिल्म के गहरे स्तर पर यह केवल देवता और मनुष्य की कहानी नहीं, बल्कि आस्था और आधुनिकता के संघर्ष की कथा भी है। यहाँ “दैव” केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि उस लोकनैतिकता का प्रतीक है जो प्रकृति, मनुष्य और विश्वास को जोड़ती है। इसके विपरीत, व्यापार और लालच उस नैतिक संतुलन को तोड़ने की चेष्टा करते हैं। यह द्वंद्व ही कथा का हृदय है।
ऋषभ शेट्टी: एक आंदोलन की शुरुआत
“कांतारा” ने भारतीय सिनेमा को यह आत्मविश्वास लौटाया कि आस्था और लोककथाएँ भी समकालीन दर्शक को मोह सकती हैं। जब बॉलीवुड दशकों तक “हिंदू होना पटकथा में फिट नहीं बैठता” जैसी सीमाओं में उलझा रहा, तब ऋषभ शेट्टी ने दिखाया कि भारतीयता स्वयं में एक सार्वभौमिक भाषा है।
उनका सिनेमा हमें याद दिलाता है कि हमारे देवता, हमारे लोकगीत, हमारे पर्व ही हमारी सबसे बड़ी कहानियाँ हैं। यह फिल्म हमें हमारी मिट्टी से जोड़ती है, हमारे भीतर की उस स्मृति को जगाती है जिसे हमने “आधुनिकता” के नाम पर कहीं खो दिया था।
“कांतारा – चैप्टर 1” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। यह हमें सिखाती है कि तर्क का जहाँ अंत होता है, वहीं से आस्था की यात्रा शुरू होती है। सिनेमा प्रेमियों के लिए यह अनुभव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मिक साधना है।
ऋषभ शेट्टी ने जो संसार रचा है, वह भारतीय लोककला का जीवित दस्तावेज़ है — ऐसी फिल्म, जिसे केवल देखा नहीं, महसूस किया जाना चाहिए। “कांतारा” हमारी सभ्यता की गूंज है — एक स्मृति, एक श्रद्धा, एक आत्मदर्शन।