सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: विनाश पर सृजन की विजय के 1000 वर्ष, पढ़िए राख से उठकर शिखर तक पहुँचने की अमर गाथा, लुटेरों के निशाने पर क्यों रहा भारत का स्वर्ण द्वार?

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गुजरात के प्रभास पाटन के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर न केवल भारत का प्रथम ज्योतिर्लिंग है, बल्कि यह भारतीय अस्मिता और अडिग साहस का जीवंत प्रतीक भी है। वर्ष 2026 इस पावन तीर्थ के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह जुड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विशेष अवसर को 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के रूप में मनाने का आह्वान किया है, जो दो महत्वपूर्ण कालखंडों का संगम है:

 

1.     संघर्ष के 1000 वर्ष: साल 1026 में महमूद गजनवी के भीषण आक्रमण और विध्वंस की सहस्राब्दी स्मृति।

 

2.     पुनरुद्धार के 75 वर्ष: 11 मई 1951 को स्वतंत्र भारत में मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की हीरक जयंती।

 

इतिहास के झरोखे से: आखिर सोमनाथ ही क्यों था निशाने पर?

 

इतिहासकारों के अनुसार, सोमनाथ पर बार-बार हुए हमलों के पीछे धार्मिक कट्टरता के साथ-साथ कई गहरे राजनीतिक और आर्थिक कारण भी थे:

 

·         अतुलनीय वैभव और खजाना: सोमनाथ प्राचीन भारत का सबसे समृद्ध मंदिर था। यहाँ राजाओं और विदेशी व्यापारियों द्वारा चढ़ाया गया स्वर्ण और रत्नों का भंडार आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण था।

 

·         सामरिक और भौगोलिक स्थिति: समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण यह पश्चिमी भारत का प्रवेश द्वार था। यहाँ व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण का अर्थ था सत्ता पर पकड़।

 

·         सत्ता का प्रतीक: उस दौर में बड़े मंदिरों को नष्ट करना आक्रमणकारी की शक्ति के प्रदर्शन और स्थानीय मनोबल को तोड़ने का जरिया माना जाता था।

 

·         राजनीतिक अस्थिरता: जब भी क्षेत्रीय सत्ता कमजोर हुई या आंतरिक संघर्ष बढ़े, बाहरी आक्रमणकारियों ने इस सांस्कृतिक केंद्र को निशाना बनाया।

 

·         ऐतिहासिक ख्याति: हमलावर जानते थे कि इस विश्वप्रसिद्ध मंदिर पर आक्रमण उन्हें इतिहास के पन्नों में 'विजेता' के रूप में दर्ज कराएगा।

 

विद्वानों का नजरिया: जहाँ रोमिला थापर इसे राजनीतिक प्रतीक के रूप में देखती हैं, वहीं आर.सी. मजूमदार संपत्ति की लूट को मुख्य कारण मानते हैं। सतीश चंद्र के अनुसार यह शक्ति और व्यापार पर नियंत्रण की जंग थी, तो आर.एस. शर्मा इसे शासकों की कमजोरी का परिणाम बताते हैं।

 

आस्था और विज्ञान का अद्भुत संगम: सोमनाथ की 5 विशेष मान्यताएं

 

1.     चंद्रदेव का तप स्थल: पौराणिक कथा है कि राजा दक्ष के श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रमा (सोम) ने यहीं शिव की तपस्या की थी। इसीलिए इसे चंद्र से जुड़ा एकमात्र शिव तीर्थ माना जाता है।

 

2.     बाणस्तंभ और 'निष्कलंक अक्षांश': मंदिर के दक्षिण में अंटार्कटिका (साउथ पोल) तक 6000 किमी तक कोई जमीन नहीं है। प्राचीन बाणस्तंभ पर लिखा संस्कृत श्लोक आज के आधुनिक भूगोल की पुष्टि करता है।

 

3.     मर्यादित समुद्र: अरब सागर की लहरें मंदिर की चौखट तक तो आती हैं, लेकिन गर्भगृह को कभी नहीं छूतीं। भक्त इसे महादेव की मर्यादा मानते हैं।

 

4.     राख से उठ खड़ा होने वाला मंदिर: यह मंदिर आस्था की उस शक्ति का प्रमाण है जो हर बार टूटने के बाद और अधिक भव्यता के साथ पुनर्निर्मित हुआ। इसे 'अनश्वर' (Eternal) मंदिर कहा जाता है।

 

5.     चंदन के द्वारों की गाथा: गजनवी द्वारा लूटे गए द्वार 1951 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रयासों से वापस लाए गए। हालाँकि, इसके प्रमाणों को लेकर इतिहासकारों में आज भी मतभेद हैं।

 

सोमनाथ की कथा केवल विध्वंस की नहीं, बल्कि 'विनाश पर सृजन' की जीत की कहानी है। 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' हमें याद दिलाता है कि पत्थर टूट सकते हैं, लेकिन एक जीवंत सभ्यता का संकल्प कभी नहीं मरता।

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