वाराणसी। साइबर अपराधियों ने ठगी के नए हथकंडे अपनाते हुए अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या के पूर्व कुलपति और वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. गुलाबचंद्र राम जायसवाल को अपना शिकार बनाने की कोशिश की। ठगों ने करीब दो घंटे तक उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” में रखकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ने का भय दिखाया। समय रहते उनकी पत्नी की सतर्कता और राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल के हस्तक्षेप से यह साजिश विफल हो गई।
घटना रविवार की है। दोपहर लगभग दो बजे डॉ. जायसवाल के मोबाइल पर एक कॉल आई। फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को एक केंद्रीय जांच एजेंसी से जुड़ा अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि डॉ. जायसवाल के मोबाइल नंबर का इस्तेमाल पहलगाम में हुई आतंकी घटना से संबंधित एक वीडियो कॉल में हुआ है। यह सुनते ही प्रोफेसर स्तब्ध रह गए।
इसके बाद ठगों ने वीडियो कॉल के जरिए एक व्यक्ति को पुलिस की वर्दी में दिखाया और मामले को बेहद गंभीर बताते हुए डराने लगे। कॉल पर मौजूद लोगों ने कहा कि जांच पूरी होने तक उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” किया जा रहा है और उन्हें किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं है। साथ ही चेतावनी दी गई कि नियम तोड़ने पर तत्काल कानूनी कार्रवाई होगी।
लगातार धमकियों और गिरफ्तारी के डर के बीच ठगों ने डॉ. जायसवाल से उनके बैंक खातों, जरूरी दस्तावेजों और निजी जानकारियों के बारे में पूछताछ शुरू कर दी। मानसिक दबाव इतना अधिक था कि कुछ समय के लिए वे पूरी तरह घिरते हुए महसूस करने लगे। इसी दौरान उनकी पत्नी ने पूरे घटनाक्रम को देखा और बातचीत के लहजे व दावों पर संदेह जताया।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने बिना देर किए राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल से फोन पर संपर्क किया और पूरी बात बताई। मंत्री ने तत्काल इसे साइबर ठगी का मामला मानते हुए पुलिस और साइबर सेल के अधिकारियों से बात की। उनके निर्देश पर ठगों की वीडियो कॉल को होल्ड पर रखवाया गया और डॉ. जायसवाल को आश्वस्त किया गया कि वे किसी भी आपराधिक या आतंकवादी गतिविधि से जुड़े नहीं हैं।
मंत्री के हस्तक्षेप और पुलिस की सक्रियता के बाद ठगों का दबाव टूट गया। कुछ ही देर में वीडियो कॉल बंद हो गई और डॉ. जायसवाल इस मानसिक कैद से बाहर आ सके। इसके बाद उन्होंने राहत की सांस ली और पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस को दी।
इस संबंध में सिगरा थाने में प्राथमिक सूचना दर्ज कराई गई है। थाना प्रभारी के अनुसार, मामले की जांच साइबर सेल की सहायता से की जा रही है। कॉल करने वालों के मोबाइल नंबर, वीडियो कॉल के माध्यम और उनके संभावित नेटवर्क की पड़ताल की जा रही है, ताकि इस गिरोह तक पहुंचा जा सके।
पुलिस ने इस घटना को लेकर आम लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी अनजान कॉल या वीडियो कॉल पर खुद को अधिकारी बताने वालों की बातों में न आएं। “डिजिटल अरेस्ट” जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। यदि कोई व्यक्ति डराकर बैंक विवरण, ओटीपी या निजी जानकारी मांगता है तो तुरंत कॉल काटें और पुलिस या साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराएं।
डिजिटल अरेस्ट से बचने के जरूरी टिप्स
आजकल साइबर ठग “डिजिटल अरेस्ट” जैसे शब्दों का डर दिखाकर लोगों को फंसाने की कोशिश कर रहे हैं। ध्यान रखें—भारत के कानून में “डिजिटल अरेस्ट” जैसा कोई प्रावधान नहीं है। साइबर एक्सपर्ट मृत्युंजय सिंह बताते हैं कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए ये बातें जरूर अपनाएं:
घबराएं नहीं, कॉल तुरंत काटें
कोई भी व्यक्ति अगर खुद को पुलिस, CBI, NIA, ED या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर डराए, तो शांत रहें। ऐसे मामलों में घबराना ठगों की सबसे बड़ी ताकत होती है।
वीडियो कॉल पर वर्दी देखकर भरोसा न करें
पुलिस की वर्दी, फर्जी आईडी या ऑफिस जैसा बैकग्राउंड दिखाकर वीडियो कॉल करना अब आम तरीका है। सिर्फ वर्दी देखकर किसी पर भरोसा न करें।
व्यक्तिगत जानकारी बिल्कुल साझा न करें
OTP, बैंक अकाउंट नंबर, आधार, पैन, पासवर्ड या दस्तावेज किसी भी कॉल या वीडियो कॉल पर न दें। असली सरकारी अधिकारी फोन पर ऐसी जानकारी नहीं मांगते।
“किसी से बात मत करो” कहना बड़ा संकेत है
अगर कॉल करने वाला आपसे कहे कि इस बारे में किसी को न बताएं, तो समझ जाएं कि यह ठगी है। असली जांच में परिवार या वकील से बात करने से नहीं रोका जाता।
तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताएं
परिवार के सदस्य, दोस्त, वकील या किसी जिम्मेदार व्यक्ति को तुरंत जानकारी दें। अकेले फैसला न लें।
स्थानीय पुलिस या साइबर सेल से संपर्क करें
ऐसी कॉल आते ही नजदीकी थाने, साइबर सेल या राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर सूचना दें।
संदिग्ध नंबर और कॉल रिकॉर्ड सुरक्षित रखें
कॉल करने वाले नंबर, स्क्रीनशॉट, वीडियो कॉल का रिकॉर्ड (अगर संभव हो) संभालकर रखें। यह जांच में मददगार होता है।
सोशल मीडिया और मोबाइल सुरक्षा मजबूत रखें
· अनजान ऐप डाउनलोड न करें
· फोन में स्क्रीन शेयर/रिमोट एक्सेस न दें
· सोशल मीडिया पर निजी जानकारी सीमित रखें
परिवार के बुजुर्गों को जरूर जागरूक करें
साइबर ठग अक्सर शिक्षित और बुजुर्ग लोगों को निशाना बनाते हैं। उन्हें पहले से इन तरीकों के बारे में बताएं।
याद रखें – गिरफ्तारी फोन पर नहीं होती
किसी भी अपराध में गिरफ्तारी नोटिस, समन या लिखित प्रक्रिया से होती है, न कि WhatsApp या वीडियो कॉल पर।