यूपी वन निगम के नाम पर 64.82 करोड़ की ठगी: फर्जी खाते से लेकर करोड़ों की ट्रांसफर तक, CBI ने संभाली जांच

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश वन निगम (UPFC) के नाम पर 64.82 करोड़ रुपये के बड़े वित्तीय गबन के मामले में अब जांच की जिम्मेदारी केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के हाथों में चली गई है। बैंक ऑफ इंडिया की सदर शाखा में फर्जी तरीके से खाता खोलकर इस रकम की हेराफेरी की गई थी। बैंक शाखा प्रबंधक की शिकायत पर सीबीआई ने मामला दर्ज करते हुए एक साथ दिल्ली, गाजियाबाद और कानपुर में आरोपियों के ठिकानों पर छापेमारी की है।

 

फर्जी पहचान से रची गई सुनियोजित साजिश

 

सीबीआई की प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि अनीस उर्फ मनीष और दीपक संजीव सुवर्णा ने खुद को उत्तर प्रदेश वन निगम का अधिकृत अधिकारी बताकर बैंक को भ्रमित किया। दोनों आरोपियों ने निगम के नाम से जाली केवाईसी दस्तावेज, पैन कार्ड, जीएसटी रजिस्ट्रेशन और बोर्ड से जुड़े प्रमाण पत्र तैयार किए। इन्हीं फर्जी कागजातों के आधार पर बैंक में यूपीएफसी के नाम से बचत खाता खुलवाया गया।

 

18 दिसंबर को रखी गई ठगी की बुनियाद

 

सीबीआई सूत्रों के मुताबिक, 18 दिसंबर 2025 को दीपक संजीव सुवर्णा ने बैंक अधिकारियों को बताया कि यूपी वन निगम की ओर से थोक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की नीलामी प्रक्रिया शुरू की जा रही है और उसे निगम की तरफ से खाता खोलने का अधिकार प्राप्त है। इस दावे के समर्थन में बैंक को जाली दस्तावेज सौंपे गए, जिन पर भरोसा कर बैंक ने खाता खोल दिया।

 

करोड़ों की रकम ट्रांसफर होते ही हुआ खेल

 

1 जनवरी 2026 को यूपी वन निगम के आधिकारिक खाते से 64.82 करोड़ रुपये बैंक ऑफ इंडिया में जमा कराए गए। इसके बाद बैंक को प्रबंध निदेशक के नाम से एफडी बनाए जाने से संबंधित एक ईमेल भी प्राप्त हुआ।

 

अगले ही दिन यानी 2 जनवरी को बैंक में एक फर्जी पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसके आधार पर 6.82 करोड़ रुपये की एफडी बनाई गई और शेष 58 करोड़ रुपये फर्जी खाते में ट्रांसफर करा लिए गए।

 

वन निगम को जानकारी मिलते ही खुला मामला

 

जब इस संदिग्ध लेन-देन की भनक उत्तर प्रदेश वन निगम को लगी, तो निगम के प्रबंध निदेशक अरविंद कुमार सिंह ने 13 जनवरी को लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट में गबन का मुकदमा दर्ज कराया। इसके बाद बैंक ऑफ इंडिया ने भी आंतरिक जांच कर मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई से औपचारिक शिकायत की।

 

छापेमारी में अहम सुराग, बड़े नेटवर्क की आशंका

 

सीबीआई की कई टीमों ने एक साथ अलग-अलग शहरों में दबिश देकर महत्वपूर्ण दस्तावेज, डिजिटल डेटा और बैंकिंग लेन-देन से जुड़े सबूत बरामद किए हैं। जांच एजेंसी को संदेह है कि यह घोटाला सिर्फ दो आरोपियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित गिरोह सक्रिय हो सकता है, जिसमें बैंकिंग और दस्तावेजी प्रक्रिया की गहरी समझ रखने वाले लोग शामिल हैं।

 

फिलहाल सीबीआई पूरे मामले की परत-दर-परत जांच कर रही है। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां तथा चौंकाने वाले खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

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